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The Science of getting Rich|| D.WATTLES WALLANCE AND WALLANCE D. WATTLES

इंट्रोडक्शन (Introduction) क्या आप अमीर होने का ख्वाब देखते है? क्या आप एक अच्छी लाइफ जीना चाहते हो? क्या आप लाइफ में बेस्ट बनना चाहते हो? तो इस बुक में आप सक्सेस, हैप्पीनेस और अमीर बनने का सीक्रेट पढेंगे. आप चाहे जिस बैकग्राउंड से बिलोंग करते हो, फिर भी आप अमीर हो सकते हो. आपके सपने सच हो सकते है. क्योंकि ये बुक आपको अमीर बनने का एक्जेक्ट तरीका बताएगी. बस आपको वो टेक्नीक्स और गाइडलाइन्स फोलो करनी होगी जो इस बुक में दी गयी है. जो लाइफ आप जीना चाहते हो, आपसे ज्यादा दूर नहीं है. पर इसके लिए आपको एक सर्टेन वे में सोचना होगा. जो आपके पास है, आपको दूसरो के प्रति थैंकफुल होना चाहिए. आपकी कोशिश यही हो कि आप दूसरो के काम आ सके. आप इस बुक में पढ़ी हुई बातो को अपनी लाइफ में अप्लाई करोगे तो आपको कोई भी अमीर होने से नहीं रोक पायेगा.    द राईट टू बी रिच (The Right to be Rich) क्या अमीर होने की चाहत रखना गलत है? ऐसा कौन है जो एक आराम की लाइफ नहीं चाहता? क्या ये सपना देखना गलत है? नहीं, बिलकुल नहीं. अमीरी का मतलब सिर्फ पैसे से नहीं है. बल्कि इसका मतलब है कि आपके पास ऐसे टूल्स होने चाहि...

Creative Confidence || Tom Kelly & David kelly || In Hindi

Summary:- Creative Confidence
इंट्रोडक्शन (Introduction)
मान लो आपके पास एक पेपर का टुकड़ा है. अब इसमें सेम साइज़ के 30 सर्कल्स ड्रा करो. पर आपको सर्कल्स ऐसे ड्रा करने है कि इससे कोई ऑब्जेक्ट बन सके. कोई भी ऑब्जेक्ट हो सकता है जैसे क्लॉक, बॉल, फिश टैंक या कोई स्टॉप का साईंन कुछ भी. आप चाहो तो 3 मिनट में जितने चाहे सर्कल्स ट्रांसफॉर्म कर सकते हो. 
अगर आप सारे 30 सर्कल्स फिनिश नहीं कर पाए तो कोई बात नहीं. ज़्यादातर लोग नहीं कर पाते है. लेकिन आपने इन सर्कल्स से इमेज क्या बनाई ? कोई नॉर्मल सी चीज़ जैसे बास्केटबॉल, एक बिल्लार्ड बॉल या सॉकर बॉल? या फिर कोई फनी चीज़ जैसे प्लानेट, कुकी, पिज़्ज़ा या हैप्पी फेस? 
आपने कभी रूल्स ब्रेक किये है ? या इस बारे में सोचा है ? इन 30 सर्कल्स से आप कोई बड़ी इमेज क्रिएट कर सकते हो जैसे स्नोमेन या ट्रैफिक लाईट. आप कुछ भी बना सकते हो, कोई रूल् फिक्स नहीं है. इन 30 सर्कल्स से आप जो चाहे वो बना लो. 
कुछ ऐसे ही एक्सपीरिएंस आपको डी. स्कूल में होते है जहाँ आपको इस टाइप के टास्क दिए जाते है. डेविड कैली ने स्टैंडफोर्ड यूनिवरसिटी में इस इंस्टीट्यूट की फाउंडेशन रखी थी. अगर बिजनेस के लिए बी स्कूल्स है तो डिजाईन थिंकिंग के लिए डी स्कूल है. यहाँ डिफरेंट फील्ड्स के लोग आते है जिन्हें  क्रिएटिव कांफिडेंस सिखाया जाता है. 
जब आप क्रिएटिविटी शब्द सुनते हो तो आपके माइंड में क्या आता है? आप शायद बोलो कि आर्टिस्ट, पेंटर्स, म्यूजिशियंस और एनीमेंटर्स क्रिएटिव लोग होते है. आपको शायद वेब डिज़ाइनर्स और अर्कीटेकट्स भी क्रिएटिव लगते होंगे जबकि लॉयर्स, साइंटिस्ट और सीईओ नहीं. या शायद आप बोलोगे कि आप क्रिएटिव टाइप नहीं हो. 
पर डेविड और टॉम कैली का मानना है कि हर कोई क्रिएटिव बन सकता है. चाहे आप जिस भी फील्ड में हो, जो भी जॉब करते हो, किसी भी पोजीशन में हो, आप अपने टास्क को क्रिएटिव बना सकते हो. जब आप अपने जॉब में कोई न्यू आईडिया या सोल्यूशन लेकर आते हो जिससे लोगो को बेनिफिट हो तो ये भी आपकी क्रिएटिविटी है. अब जैसे मान लो आपने कोई ऐसा टूल या सिस्टम क्रिएट किया जो यूज़ करने में ज्यादा आसान हो, अफोर्डेबल और प्रोडक्टिव हो तो ये आपकी क्रिएटिविटी मानी जायेगी. 
क्रिएटिव कांफिडेंस हमारे अंदर न्यू आईडियाज़ डिजाईन क्रिएट करने और उन्हें इम्प्लीमेंट करने की एबिलिटी का नाम है. हम में से ज्यादातर लोग अपने रूटीन जॉब में बिजी रहते है. इसलिए जो भी स्ट्रेटेज़ीज़ या सिस्टम है, उसे हम एक्स्पेट कर लेते है. पर अगर कोई बैटर सोल्यूशन मिले तो क्या अच्छा नहीं है? अगर कोई ऐसा ब्रिलिएंट आईडिया मिल जाए जिससे सबको फायदा हो तो? 
इस बुक आप पढेंगे कि क्रिएटिव कांफिडेंस हमे अनलिमिटेड पोसिबिलिटीज़ देती है.
 
फ्लिप Flip
फ्रॉम डिजाईन थिंकिंग टू क्रिएटिव कांफिडेंस ( डिजाईन थिंकिंग से क्रिएटिव कांफिडेंस तक ) From Design Thinking to Creative Confidence
डग डाईटज़ (Doug Dietz) जर्नल इलेक्ट्रिक में 24 सालो से काम कर रहे है. आजकल उन्हें जीई हेल्थ केयर के लिए इमेजिंग सिस्टम डेवलप करने का असाइनमेंट मिला है.  ये कंपनी का एक $18 बिलियन डिविजन है. डग को न्यू हाई टेक एम्आरआई मशीन फिनिश करने में ढाई साल लगे. हर यूनिट में कई मिलियन डॉलर्स का खर्चा आया है.
 
डग उस होस्पिटल में विजिट के लिए गए जहाँ फर्स्ट यूनिट्स इंस्टाल्ड की गयी थी. वो एम्आईआई टेक्निशियंस से मिले और उनसे पुछा कि आपको ये मशीन कैसी लगी. डग ने उन्हें प्राउडली ये भी बताया कि ये मशीन इंटरनेशनल डिजाईन एक्सीलेंस अवार्ड के लिए नोमिनेट हुई है. ये अवार्ड डिजाईन अवार्ड्स का ऑस्कर्स माना जाता है. लेकिन डग की बात सुनकर टेक्नीशियन ने बस इतना बोला कि थोडा साइड हो जाओ. 
तभी वहां एक पेशेंट आया जिसकी स्कैनिंग होनी थी. ये एक छोटी सी दुबली-पतली लड़की थी जिसने अपने पेरेंट्स का हाथ पकड़ा था. वो नर्वस थी. उसे स्कैनिंग करवाते हुए काफी डर लग रहा था. मशीन काफी बड़ी और मेंटल से बनी हुई थी. स्कैनिंग के लिए मशीन के अंदर जाना पड़ता था. जब उस बच्ची को एम्आरआई के पास ले जाया गया तो वो रोने लगी. 
उसके पेरेंट्स उसे हिम्मत बंधा रहे थे इसके बावजूद लड़की डर रही थी. इसी बीच एनेस्थेयालोजिस्ट को बुलाया गया. डग को पता चला कि छोटे बच्चे मशीन को देखकर बहुत ज्यादा डर जाते है इसलिए उन्हें एम्आरआई मशीन के अंदर भेजने से पहले सीडेटे कर दिया जाता है. 
और उसी पल डग को लगा कि उनका डिजाईन फेल हो गया है. हालंकि उन्हें अपने डिजाईन पर प्राउड था पर जिन पेशेंट्स को रियल में ये प्रोजेक्ट यूज़ करना था अगर ये प्रोजेक्ट उन्हें ही पंसद ना आये तो क्या फायदा. डग इस बात से बड़े डिसअपोइन्ट हुए कि उनकी ये मशीन छोटे बच्चो को डरा रही थी. 
कोई और होता तो शायद ज्यादा टेंशन नहीं लेता और अपने बाकि प्रोजेक्ट में लग जाता. पर डग जानते थे कि उन्हें कुछ करना है. उन्हें बॉस ने उन्हें एडवाइस दी कि वो जाकर स्टैंडफोर्ड के डी. स्कूल से कोर्स करे. ये वन वीक का कोर्स था जिसे एक्जीक्यूटिव एजुकेशन कोर्स बोला जाता है. डग इस बात को लेकर थोडा डाउट में थे कि इस कोर्स से उन्हें बेनिफिट होगा या नहीं पर अपने बॉस की बात मानकर वो ये कोर्स करने चले गए. 
डी. स्कूल में डग ने क्रिएटिव कांफिडेंस के बारे में सीखा. उन्हें ह्यूमन सेंटर्ड डिजाईन प्रोसेस के बारे में सीखने को मिला जिसमे यूजर्स की नीड, उसके थौट्स और फीलिंग्स को डिजाईन की नंबर वन प्रायोरिटी माना जाता है. यानी जिन लोगो के लिए आप प्रोडक्ट बना रहे हो, आपको उनके लिए एक्चुअल में एम्पैथी होनी चाहिए. 
डग ने ये भी सीखा कि किसी भी इंडस्ट्री में ह्यूमेन सेंटर्ड डिजाईन काफी इम्पोर्टेंट है. क्योंकि यही वो फैक्टर है जो लोगो की लाइफ में बदलाव ला सकता है. डग ने डिसाइड किया कि वो अब ऐसी मशीन बनायेंगे जिससे छोटे बच्चे बिल्कुल भी ना डरे. 
लेकिन डग ये भी जानते थे कि उन्हें एक और नयी एम्आरआई मशीन बनाने के लिए और फंडिंग नही मिल सकती. इसलिए उन्होंने एक्सपीरिएंस को रीक्रिएट करने पर फोकस किया. और उसे एडवेंचर सिरीज़ नाम दिया. 
डग ने स्कैनर के अंदर कोई चेंज नहीं किया. बल्कि उन्होंने इसके बाहर से ट्रांसफॉर्म करने के बारे में सोचा. सिर्फ व्हाईट और मेटल के बदले डग ने एम्आरआई मशीन्स को पाइरेट शिप्स या स्पेसशिप के डिजाईन में पेंट करवा दिया. उन्होंने कमरे की वाल्स और सीलिंग भी डेकोरेट करवा दी. जिस मेटल बेड पर पेशेंट्स को लेटना होता था, उसे भी डेकोरेट करवा दिया. ये सारे इक्किप्मेंट्स थीम का पार्ट बन गए.
 
अब जो नई स्कैनर मशीन बनकर रेडी हुई वो बच्चो को बड़ी मजेदार लगती थी. उन्हें लगता था कि जैसे वो किसी डरावने मेडिकल प्रोसीजर के लिए नहीं बल्कि किसी अम्यूज़मेंट पार्क की राइड के लिए जा रहे है. इस एक्सपेरिमेंट के बाद अमेरिका के अंदर बच्चो के होस्पिटल्स में नौ डिफरेंट एडवेंचर्स इन्सटाल्ड किये गए है. जब कोई बच्चा स्कैनर में एंटर करता है तो एमआरआई मशीन उसे एक्सप्लेन करती है कि वो चुपचाप लेटा रहे क्योंकि वो एक समुंद्री यात्रा पर जाने वाले है या फिर उनका स्पेसशिप टेकऑफ करने वाला है. इसलिए अब स्कैनिंग कराने के लिए बच्चो को सिडेट करने की जरूरत नहीं पड़ती, ना ही किसी एनिस्थियालोजिस्ट को बुलाना पड़ता है क्योंकि ज्यादातर बच्चे ख़ुशी-ख़ुशी मशीन के अंदर चले जाते है.
 
अब ज्यादा से ज्यादा बच्चे इस प्रोसीजर के लिए खुद से रेडी हो जाते है. और ये बच्चो के साथ-साथ उनके पेरेंट्स, होस्पिटल और जीई हेल्थकेयर के लिए किसी विन-विन सिचुएशन से कम नहीं है. डग का सबसे हैप्पी मोमेंट वो था जब एक उसने सुना कि एक छोटी लड़की पूछ रही थी” क्या मै एक और बार एम्आरआई स्कैन करा सकती हूँ” ? उस वक्त डग को 100% सेटिसफेक्शन की फीलिंग हुई. और उस दिन के बाद से डग अपने हर प्रोजेक्ट में क्रिएटिव कॉन्फिडेंस और ह्यूमन सेंटर्ड डिजाईन अप्लाई करते है. 
अक्सर ये होता है कि प्रोडक्ट डिजाईन करते वक्त कहीं ह्यूमन टच छूट जाता है. हम सिर्फ टेक्निकल और बिजनेस साइड पर ही फोकस करते है. अब ज़रा एक वेन डायग्राम (Venn diagram ) के बारे में सोचो जिसमे तीन ओवरलैपिंग सर्कल्स हो. इसमें फर्स्ट प्रेक्टिकल टेक्नोलोजी के लिए है, सेकंड सस्टेनेबल बिजनेस के लिए और थर्ड लोगो के साथ एम्पैथी की फीलिंग के लिए.
 
डिजाईन मेकिंग में ऑर्गेनाइजेशंस को इन तीनो फैक्टर्स के बीच बेलेंस क्रिएट करना चाहिए. ये एक ऐसे कॉमन स्पॉट पर हो जहाँ सारे सर्कल्स ओवरलैप हो रहे हो. क्योंकि एक सक्सेसफुल प्रोजेक्ट का सीक्रेट यही है.
 डेयर Dare
फ्रॉम फियर टू करेज़ From Fear To Courage
क्या आप सांप से डरते है ? अल्बर्ट बंडूरा (Albert Bandura, ) स्टैंडफोर्ड यूनीवरसिटी के प्रोफेसर एमेरिटस कहते है कि अपने फोबिया से छुटकारा पाने के लिए आपको एक बार सांप को छू कर देखना होगा. और बंडूरा का दावा है कि इस ट्रीटमेंट से एक दिन में ही आपका सांपो का डर हमेशा के लिए दूर हो जायेगा. 
एक साईंकोलोजिस्ट के तौर पर बंडूरा को इस फील्ड में 50 साल से भी ज्यादा का एक्स्पिरिएंस है. वो अब 87 के है फिर भी अपने स्टैंडफोर्ड के ऑफिस में काम करना पसंद करते है. जिन पेशेंट्स को वो ट्रीट करते है, इनमे से ज्यदातर लोगो ने अपनी पूरी लाइफ इसी फोबिया के साथ जी है और इससे छुटकारा भी पाया है, बल्कि उनके अंदर एक नयी हिम्मत आई है. 
इस टेक्नीक को स्टेप बाई स्टेप करना होता है. इमेजिन करो आप बंडूरा के ऑफिस में हो और आपको सांपो से सबसे ज्यादा डर लगता है. तो पहले बंडूरा आपको बोलेंगे कि साथ वाले रूम में एक बोआ कंस्ट्रिकटर है और आपको उस रूम में जाना है. ऑफ़ कोर्स आप यही बोलेंगे” क्या! नहीं, कभी भी नहीं चाहे कुछ भी हो जाये” 
अब उसके बाद आपको कुछ चेलेंजेस मिलेंगे जो आपको सांप के नजदीक ले जायेंगे. वहां एक वन वे मिरर है जिसके थ्रू आप देख सकते हो कि एक आदमी अपने गले में एक बोआ कंस्ट्रिकटर लपेटे खड़ा है. बंडूरा आपसे पूछेंगे कि अब आगे क्या होगा. तो आप बोलोगे” सांप इस आदमी के गले को चोक करके इसे मार डालेगा. 
लेकिन उस आदमी को कुछ नही होता है. बोआ कंस्ट्रिकटर ऐसे ही उस आदमी के गले में पड़ा रहता है. इसकी लॉन्ग और मोटी बॉडी धीरे-धीरे मूव करती है. अब बंडूरा आपको उस रूम के डोर पर खड़े होने को बोलेंगे जहाँ सांप है. आपको बस दूर से देखना है. आपकी हिम्मत बढ़ाने के लिए बंडूरा आपके साथ खड़े हो जाते है. 
तो अब तक आप सांप के कुछ स्टेप्स क्लोज तो आ ही चुके हो. अब आप सांप से सिर्फ कुछ फीट की दूरी पर हो. और सेशन के एंड तक आपको फाईनली सांप के पास जाकर उसे टच करने को बोला जायेगा. आप हिचकते हुए सांप को छू लेते हो. आप अपना हाथ बढाकर उसकी बॉडी को टच कर लेते हो. और आखिर आपने वो कर ही दिया जिससे आप सबसे ज्यादा डरते थे. इस एक्सपेरिमेंट के बाद बंडूरा के ज्यादातर पेशेंट्स का फोबिया दूर हुआ है. कुछ मंथ्स बाद जब वो दुबारा पेशेंट्स से मिलते है तो पेशेंट्स बताते है कि अब उन्हें सांपो से डर नहीं लगता. एक औरत को तो सपना भी आया था कि बोआ कंस्ट्रिकटर उसे बर्तन धोने में हेल्प कर रहा है. उसे अब और सांपों के डरावने सपने नही आते.
 
तो इस ट्रीटमेंट में होता क्या है? बंडूरा इसे “गाईडेड मास्टरी” बोलते है. इसका सीक्रेट है कि पेशेंट को पहले ऐसा टास्क दो जो वो ईजिली हैंडल कर सके, उसके बाद दूसरा और फिर तीसरा जब तक कि वो अपना गोल ना अचीव कर ले. यानी एक टाइम में एक स्माल स्टेप.
 
इस ट्रीटमेंट के बाद पेशेंट्स ने बताया कि ना सिर्फ उनका फोबिया दूर हुआ है बल्कि उन्होंने अपने बारे में नई चीज़े भी डिस्कवर की है. अब उनके अंदर और ज्यादा हिम्मत आ गयी है न्यू एक्सपीरिएंस ट्राई करने के लिए जैसे घोड़े की सवारी, पब्लिक स्पीकिंग, या जॉब में न्यू रिस्पोंसेबिलिटीज़. उन्होंने सांप को छुआ तो उन्हें लगा कि अब वो हर काम कर सकते है.
 
इसी तरह क्रिएटिव कांफिडेंस में भी वन स्टेप एट अ टाइम का कांसेप्ट अप्लाई किया जा सकता है. आपका सबसे बड़ा डर क्या है जो आपको क्रिएटिव बनने से रोक रहा है? क्या आप कुछ नया ट्राई करने से डरते हो? इसे फियर ऑफ़ फेलर भी बोल सकते है. बिलकुल सांप की तरह ही ये फियर तभी दूर होगा जब तक कि आप खुद इसे एक्सपीरिएंस नहीं करते.
 
इन फैक्ट, क्रिएटिव जीनियस जैसे मोजार्ट और डार्विन अक्सर फेल होते रहते थे. लेकिन ये लोग इसीलिए सक्सेसफुल हुए क्योंकि इन्होने फेल होने के डर से ट्राई करना नही छोड़ा. ये अपने गोल की तरफ और ज्यादा शॉट्स मारते गए. क्रिएटिव जीनियस फेल होते है पर ट्राई करना नही छोड़ते.
 
सीक्रेट यही है कि आप अपनी मिस्टेक से सीखो. फेलर्स को एक लर्निंग अपोरच्यूनिटी समझो. जब भी थॉमस एडिसन फेल होते थे तो बोलते थे कि कम से कम मुझे ये तो पता चल गया कि ये मेथड काम नहीं करेगा. वो पूरे दिन में जितने हो सके उतने ज्यादा एक्सपेरिमेंट्स करते रहते थे. यही वो चीज़ है जो लर्निंग प्रोसेस को फ़ास्ट और मोर इफेक्टिव बनाती है.
 स्पार्क (Spark)
फ्रॉम ब्लेंक पेज टू इनसाईट (From Blank Page to Insight)
लिनुस लिंग (Linus Liang,) जेन चेन, राहुल पनिक्कर और नागानन्द मूर्ती ने डी. स्कूल के डिजाईन फॉर एक्सट्रीम अफोर्डेबल कोर्स में एडमिशन लिया है.  इसे शोर्ट में एक्सट्रीम कहा जाता है. यहाँ पर पार्टिसिपेंट्स को रियल वर्ल्ड प्रोब्लम्स के लिए सोल्यूशन डेवलप करने पड़ते है. 
इस टाइम इन्हें प्रोजेक्ट मिला था डेवलपिंग कंट्रीज़ के लिए एक लो कॉस्ट इनक्यूबेटर डिजाईन करने का अब टीम में कोई भी हेल्थ एक्सपर्ट नही था. दो लोग एमबीए के स्टूडेंट्स थे, एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर था और दूसरा कंप्यूटर साइंटिस्ट. 
तो लिनुस, जेन, राहुल और नागानंद ने सबसे पहले इन्फेंट मोर्टेलिटी रेट पता करने के लिए गूगल सर्च किया. उन्हें पता चला कि हर साल 15 मिलियन बच्चे प्री मैच्योर और लो वेट पैदा होता है. और इनमे से एक मिलियन पैदा होने के 24 घंटो के अंदर मर जाते है. 
इनकी मौत का सबसे बड़ा रीजन है हाईपोथरमिया यानी बहुत ज्यादा ठंड से होने वाली डेथ. ये बच्चे कमजोर और छोटे पैदा होते है और इनकी बॉडी में इतना फैट नहीं होता कि इनका बॉडी टेम्परेचर रेगुलेट कर सके. नॉर्मल रूम टेम्परेचर भी इनके लिए फ्रीजिंग कोल्ड वाटर जितना ठंडा होता है. यही रीजन है कि प्रीमैच्योर बेबीज़ को इनक्यूबेटर में रखने की जरूरत पड़ती है.
 
हाईपोथरमिया से होने वाली डेथ इनक्यूबेटर की हेल्प से रोकी जा सकती है पर इनक्यूबेटर्स की कॉस्ट करीब $20,000 पर यूनिट पड़ती है. 
इनक्यूबेटर के कुछ पार्ट्स कम करके और सस्ता मैटीरियल यूज़ करके टीम एक लो कॉस्ट इनक्यूबेटर् बना सकती थी पर उन्होंने ह्यूमन सेंटर्ड डिजाईन को ध्यान में रखा. उन्हें मदर्स और उनके न्यू बोर्न बेबीज़ का पूरा ध्यान था. 
लिनुस नेपाल के एक सिटी होस्पिटल में गए. लेकिन उन्हें ये देखकर हैरानी हुई कि वहां के ज्यादातर इनक्यूबेटर्स अनयूज्ड रखे हुए थे. डॉक्टर ने बताया कि जिन बच्चो को इनक्यूबेटर्स की रियल में जरूरत होती है, वो ज्यादातर दूर-दराज़ के छोटे छोटे गाँवो में पैदा होते है. उनकी मदर्स न्यू बोर्न बेबी के साथ इतनी दूर ट्रेवल करके होस्पिटल नहीं आ सकती.
 
तो टीम ने रिमोट एरिया में रहने वाले मदर्स और बेबीज़ के लिए एक सोल्यूशन सोचा. एक सस्ते इनक्यूबेटर के बजाये उन्होंने एक नए आईडिया के बारे में सोचा. टीम अगर एक ऐसा डिवाइस क्रिएट करे जो मदर्स अपने घरो में यूज़ कर सके तो? 
टीम ने दिमाग लड़ाया और एक प्रोटोटाइप्स क्रिएट किये जब तक कि उन्हें एम्ब्रास नहीं मिल गया. ये बेबी के एक छोटे स्लीपिंग बैग की तरह होता है. इसके अंदर एक पाउच है जो पैराफिन का बना है. मदर को इसे बाहर निकाल कर 37 डिग्री सेल्सियस तक गर्म करना होता है. ये बेबी को पूरे चार घंटे गर्म रख सकता है. 
डिवाइस तो बन गया था अब टाइम था इसे टेस्ट करने का. टीम इण्डिया आई और उन्होंने एम्ब्रास को कुछ मदर्स पर ट्राई किया. महाराष्ट्रा में उन्हें डिवाइस को इम्प्रूव करने के बारे में एक इम्पोर्टेंट फेक्टर पता चला. 
एम्ब्रास में एक एलसीडी थर्मोमीटर होता है जो मदर्स को पैराफिन पाउच को गर्म करने में गाइड करता है. राहुल ने अनाउंस किया कि उन्हें इसे 37 डिग्री सेल्सियस तक गर्म करना होगा. सुनकर मदर्स हैरान रह गयी. उन्हें लगता था कि वेस्टर्न मेडिसिन बहुत स्ट्रोंग होती है. अगर डॉक्टर मेडिसिन की एक चमच्च लेने को बोलता तो मदर्स सिर्फ आधा चम्मच अपने बेबीज़ को देती है.
 
तो इसलिए अगर पाउच को 37 डिग्री तक गर्म करने को बोला गया तो मदर्स सिर्फ 30 डिग्री तक ही गर्म कर रही थी. ये बात टीम के लिए एक आई ओपनर की तरह थी. उन्होंने सोचा कि नंबर्स डिस्प्ले करने के बजाए थर्मोमीटर “ओके” इंडिकेट करेगा जिससे कि पता चल जाये कि पैराफिन पाउच इस्तेमाल के लिए अब तैयार है.
 
तो इस तरह एक्सट्रीम कोर्स खत्म हुआ. टीम प्रोटोटाइप बना चुकी थी, इसलिए उनका काम अब पूरा हो चूका था. लेकिन ये प्रोडक्ट न्यू बोर्न बेबीज़ के लिए काफी इम्पोर्टेंट है इसलिए राहुल ने कहा कि वो सिर्फ ये सोचकर मूव ओन नही कर सकता कि एम्ब्रास अब बहुत से बच्चो की जान बचा रहा है. 
भले ही वो लोग अपने-अपने करियर में बिज़ी है तो भी टीम ने डिसाइड किया कि वो लोग इस प्रोडक्ट को मार्किट में लांच करेंगे. लेकिन ये काफी चेलेंजिंग भी था क्योंकि वो लोग किसी मेडिकल डिवाइस को बनाकर डिस्ट्रीब्यूट करने के बारे कुछ नहीं जानते थे. लेकिन उन्होंने फर्स्ट स्टेप उठाया और एक के बाद एक चीज़े होती चली गयी.
 
2010 में बेबी वार्मिंग डिवाइस को एबीसी न्यूज़ में दिखाया गया. इसमें निशा की स्टोरी शो की गयी थी, जो बैंगलोर में पैदा हुई एक प्रीमैच्योर बेबी थी. वो क्लिनिकल ट्रायल का एक पार्ट थी. एम्ब्रास ने उसकी लाइफ बचाई थी.
 
उसके बाद से चार लोगो की ये टीम 90 लोगो की कंपनी में बदल गयी. ये लोग प्रोडक्ट के डिजाईन में लगातार इम्प्रूवमेंट करते रहे. ये टीम गाँव और कस्बो के जरूरतमंद बच्चो तक पहुंची और उनकी जान बचाई. एम्ब्रास टीम ने बाकि देशो के एनजीओ के साथ भी पार्टनरशिप की है और अभी हाल ही में इन्होने जीई हेल्थ केयर के साथ एक ग्लोबल डिस्ट्रीब्यूशन डील साईंन की है.
 
एम्ब्रास टीम ने जब शुरुवात की थी तब उनके पास कुछ भी नहीं था, ना पैसा और ना ही मेडिकल फील्ड का कोई एक्सपीरिएंस. इस प्रोजेक्ट के शुरू में टीम की हालत किसी ब्लैंक पेज जैसी थी. लेकिन उनके अंदर ये स्पार्क आया कैसे? यहाँ कुछ स्ट्रेटेज़ी है जिन्हें आप अप्लाई कर सकते हो.
 
नंबर वन: क्रिएटिव बनो. यही से चीज़े आपके लिए चेंज होनी शुरू हो जाएँगी. नंबर टू: एक ट्रेवलर की तरह सोचो. चीजों को एक नए पर्सपेक्टिव से देखो. न्यू आईडियाज़ के लिए अपना माइंड खोलने की जरूरत है. लाइफ में न्यू एक्सपीरिएंसेस की तलाश करो.
 
नंबर थ्री: मीडियोक्रिटी से ऊपर उठो. बेशक टाइम लगे पर एक्सप्लोर करो.
नंबर फोर: अपने कस्टमर्स से एम्पैथी रखो. कोई भी प्रोडक्ट बनाने से पहले खुद को कस्टमर्स की जगह पर रखकर सोचो. उनकी तरह से देखने की, सोचने की और फील करने की कोशिश करो. नंबर फाइव: बने बनाये रूल्स को चेलेंज करो, सवाल करने की हैबिट डालो, इससे आपको प्रोब्लम को गहराई से सोचने में हेल्प मिलेगी. 
लीप (Leap)
फ्रॉम प्लानिंग टू एक्शन (From Planning to Action)
अक्षय कोठारी और अंकित गुप्ता स्टैंडफोर्ड के न्यू ग्रेजुएट्स है. अक्षय ने परड्यू (Purdue ) से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की है जबकि अंकित ने आईआईटी से कंप्यूटर साइंस किया है. दोनों गीक टाइप के है, शर्मीले से लेकिन ऐनालिटिकल नैचर के.
 
अक्षय ने डी स्कूल के डिजाईन थिंकिंग बूटकैंप के बारे में सुना और डिसाइड किया कि वो ये कोर्स ज्वाइन करेंगे. ये कोर्स उन्हें थोडा हटकर लगा, कॉलेज की रूटीन क्लासेस से एकदम डिफरेंट. और अंकित खुद मानते है कि जब वो फर्स्ट टाइम डी. स्कूल आये तो उन्हें थोडा अजीब लगा था. हर जगह कलरफुल पोस्ट इट्स लगे थे, और मैथ की तरह यहाँ सवालों का कोई सिंगल राईट आंसर नहीं होता. 
अपने फर्स्ट टास्क के लिए उन्हें एक न्यू रामेन एक्सपीरिएंस डिजाईन करने को बोला गया. अक्षय ने एक कॉमन सोल्यूशन दिया जबकि उनके क्लासमेट्स के पास बैटर क्रिएटिव आईडियाज़ थे. उनमे से एक ने एक बड़े से स्ट्रॉ का आईडिया दिया जिसमें से नूडल्स और सूप साथ में खाया जा सके. एक और क्लासमेट को एक स्पेशल कप का आईडिया आया जिससे चलते-चलते नूडल्स खाया जा सके.
 
धीरे-धीरे अक्षय और अंकित को और ज्यादा क्रिएटिव आईडियाज़ आने लगे. उन्होंने ह्यूमन सेंटर्ड डिजाईन के बारे में भी सीखा जो उनके लिए एकदम नया आईडिया था. और उन्होंने प्रोडक्ट मेकिंग में एम्पैथी की इम्पोर्टेंट भी सिखाई गयी. 
अब क्योंकि उन्हें इस एक्सपीरिएंस में मज़ा आ रहा था तो अक्षय और अंकित ने डी. स्कूल में एक और क्लास अटैंड करने की सोची. लांचपैड फोर मंथ्स का प्रोग्राम है जिसमे स्टूडेंट्स को स्क्रैच से खुद की एक कंपनी शुरू करके उसे इन्कोर्पोरेट करके खुद का प्रोडक्ट लांच करना होता है. अक्षय और अंकित को लगा कि उनसे ये नही हो पायेगा.
 
फर्स्ट स्टेप था एक बिजनेस आईडिया ढूंढ कर लाना. अब क्योंकि उन दिनो आईपेड नया-नया मार्किट में आया था तो अक्षय और अंकित ने डिसाइड किया कि वो इसके लिए एक डेली न्यूज़ एप्लीकेशन डिजाईन करेंगे. उनके पास प्रोटोटाइप बिल्ड करने के लिए सिर्फ चार दिन का टाइम था.
 
दोनों लड़के सारा दिन यूनीवरसिटी कैफ़े में रहते थे. वो रोज़ वहां 10 घंटे बैठकर अपने आईडिया पर डिस्कस करते थे. आईडिया काफी अच्छा था, उन्होंने देखा कि लोग कॉफ़ी पीते हुए न्यूज़ पढना पसंद करते थे. तो उन्होंने प्रोटोटाइप क्रिएट किया और एक आईपैड सेट अप किया. अब कोई भी आने-जाने वाला उनके एप के थ्रू न्यूज़ ब्राउस कर सकता था.
 
अक्षय और अंकित लोगो को एप यूज़ करते देखा और यूजर्स का रिस्पोंस सुनते रहे. उन्हें तुरंत इंटरफेस के ड्राबैक नजर आ गए. इस फीडबैक की वजह से उन्हें प्रोडक्ट को इम्प्रूव करने में काफी हेल्प मिली. अक्षय ने यूजर रीसर्च पर फोकस किया जबकि अंकित ने एप पर न्यू अपडेट्स कोड किये. 
एक दिन में ही वो लोग सौ चीज़े चेंज कर देते थे. इतने एफोर्ट्स डालकर उन्होंने डेली न्यूज़ एप को और भी ईजी और स्मूद बना दिया था. अपने फर्स्ट दिन में उन्हें कुछ ऐसे कमेन्ट मिले” दिस एप इज़ यूज़लेस, बेकार एप बनाई है. और बाद में वही यूजर्स पूछने लगे” क्या ये एप आईपैड में पहले से मौजूद है?”
 
अक्षय और अंकित के इस हार्ड वर्क का रिजल्ट है” पल्स न्यूज़” जोकि एक ब्रिलियंट न्यूज़ रीडर है जो सारे मेजर पब्लिकेशन्स को कवर करता है. कुछ मंथ्स बाद स्टीव जॉब्स ने एप्पल वर्ल्डवाइड डेवलपर्स कांफ्रेंस में खुद पल्स न्यूज़ को प्रेजेंट किया. और ये एप्प्ल स्टोर हाल ऑफ़ फेम के ओरिजिनल फिफ्टी एप्स में से एक बन गया. बाद में अक्षय और अंकित ने पल्स न्यूज़ लिंक्डीन को $90 मिलियन में बेच दिया.
 
ये सब उन्होंने किया कैसे? अक्षय और अंकित ने कैसे प्लानिंग को सक्सेसफूली एक्शन में ट्रांसफॉर्म किया? सबसे पहले उन्होंने” डू समथिंग” माइंडसेट अडॉप्ट किया. दोनों ने लांचपैड कोर्स की रिक्वायरमेंट से आगे सोचा. सेकंड, दोनों ने जितना जल्दी हो सके एक प्रोटोटाइप क्रिएट कर लिया. उन्होंने जो भी किया अफोर्डबल वे में और फ़ास्ट किया. थर्ड, उन्होंने पोटेंशियल कस्टमर्स का फीडबैक लिया और उनकी नीड्स समझी. फोर्थ, उन्होंने और इफेक्टिवली इनोवेशन करने के लिए टाइम लिमिट का सही इस्तेमाल किया.
 
इन दोनों यंगमेन ने शो करा दिया कि राईट एक्शन कैसे लेना है. कभी-कभी इंडीविजुअल्स और ओर्गेनाइजेशंस ऐनालिसिस के चक्कर में फंस जाते है. लोग प्लानिंग स्टेज में ही बहुत टाइम वेस्ट कर देते है. उन्हें प्लान की इफेक्टिविटी मालूम नहीं होती क्योंकि वो इसे लांच करने की हिम्मत ही नहीं कर पाते. 
जैसा कि न्यूटन का फर्स्ट लॉ ऑफ़ मोशन कहता है” अ बॉडी एट रेस्ट स्टेज़ एट रेस्ट.” आपको इस डम्बनेस से, इस स्टीलनेस से बाहर निकलना ही पड़ेगा. जैसे एक्जाम्पल के लिए अगर आप एक एंटप्रेन्योर यानी बिजनेस मेन बनना चाहते हो तो प्लानिंग से आगे बढ़ो. एक प्रोटोटाइप क्रिएट करो और लांच करो. अपने कस्टमर्स से वैल्यूएबल फीडबैक लेना मत भूलना. और जैसे-जैसे प्रोडक्ट चलता जाये, उसे अपग्रेड करते रहो. 
 कनक्ल्यूजन (Conclusion)
इस बुक में आपने क्रिएटिव कांफिडेंस के बारे में पढ़ा. क्रिएटिव कांफिडेस उसे कहते है जब हम किसी चीज़ के लिए एक नया सोल्यूशन या आईडिय लेकर आते है और उस आईडिया को रियल में अप्लाई भी करते है जिससे कि हमारी और बाकियों की लाइफ बैटर बन सके. सोचो अगर डग (Doug) ने एमआरआई मशीन रिडिजाइन नहीं की होती तो?  क्या होता अगर एम्ब्रेस टीम मार्किट में अपना डिवाइस लांच ना करते तो? और अगर अक्षय और अंकित पल्स न्यूज़ प्रोटोटाइप के साथ ही रुक गए होते तो ? stopped with the Pulse News prototype?  तो दुनिया इन ब्रिलिएंट आईडियाज़ का फायदा कभी ना उठा पाती. 
इसीलिए हम क्रिएटिव कांफिडेंस को इम्पोर्टेंस देते है. इस बात से कोई फर्क नही पड़ता कि आप कौन है, कहाँ है या क्या करते है, क्योंकि आप भी चाहे तो अपने काम में एक इम्पैक्ट डाल सकते है, उसमे एक पोजिटिव चेंज ला सकते है. इसलिए अपने अंदर की क्रिएटिविटी को बाहर निकालो और अपने साथ-साथ लोगो की लाइफ भी इम्प्रूव करो.
 
आपने इस बुक में एम्पैथी और ह्यूमन सेंटर्ड डिजाईन के बारे में पढ़ा. इस बारे में रीसर्च करो, एंड यूजर्स से इंटरएक्ट करो और उनकी सिचुएशन को समझने की कोशिश करो. इससे आप दिल लगाकर एक सक्सेसफुल प्रोडक्ट बनाने में कामयाब होंगे.
 
आपको सीखना होगा कि फेलर के डर को अवॉयड करके लर्निंग प्रोसेस को कैसे स्पीड अप किया जाए. एक टाइम में एक ही स्टेप लो. आपके रास्ते का हर चेलेजं आपका कांफिडेस बूस्ट करेगा और आप अपने गोल के और क्लोज आ जाओगे. आप जितनी जल्दी फेल होगे उतनी जल्दी ही सीख पाओगे. यानी सक्सेस का एक ही सीक्रेट है कि जितनी बार ट्राई करोगे और जितना ज्यादा फेल होगे, उतना ही ज्यादा सीखोगे. 
आपने इस बुक में सीखा कि अपने अंदर वो स्पार्क कैसे लाये जो आपको कुछ इनोवेटिव आईडिया दे सके.  चीजों को देखने का एक डिफरेंट तरीका सोचो और एक्सप्लोर करो. हमेशा सवाल पूछो. बने-बनाये रूल्स को चेलेंज करना सीखो.
 
आपको सीखना होगा कि प्लान्स को एक्शन में कैसे बदला जाए. सिर्फ प्लानिंग स्टेज में मत अटके रहो. एक प्रोटोटाइप क्रिएट करो, उस पर इमिडीएट फीडबैक लो और जरूरी इम्प्रूवमेंट्स करो.
 
उम्मीद है कि ये बुक आपको और भी ज्यादा क्रिएटिव फील कराएगी. अपना माइंडसेट चेंज करो, जो चीज़ आपको डराती है उसका डटकर मुकाबला करो, नए आईडियाज़ सोचो और एक्शन लो. खुद पर यकीन रखो. आपके अंदर वो एबिलिटी है कि इस दुनिया को वंडरफुल सोल्यूशन प्रोवाइड करा सको. 
 

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