Skip to main content

The Science of getting Rich|| D.WATTLES WALLANCE AND WALLANCE D. WATTLES

इंट्रोडक्शन (Introduction) क्या आप अमीर होने का ख्वाब देखते है? क्या आप एक अच्छी लाइफ जीना चाहते हो? क्या आप लाइफ में बेस्ट बनना चाहते हो? तो इस बुक में आप सक्सेस, हैप्पीनेस और अमीर बनने का सीक्रेट पढेंगे. आप चाहे जिस बैकग्राउंड से बिलोंग करते हो, फिर भी आप अमीर हो सकते हो. आपके सपने सच हो सकते है. क्योंकि ये बुक आपको अमीर बनने का एक्जेक्ट तरीका बताएगी. बस आपको वो टेक्नीक्स और गाइडलाइन्स फोलो करनी होगी जो इस बुक में दी गयी है. जो लाइफ आप जीना चाहते हो, आपसे ज्यादा दूर नहीं है. पर इसके लिए आपको एक सर्टेन वे में सोचना होगा. जो आपके पास है, आपको दूसरो के प्रति थैंकफुल होना चाहिए. आपकी कोशिश यही हो कि आप दूसरो के काम आ सके. आप इस बुक में पढ़ी हुई बातो को अपनी लाइफ में अप्लाई करोगे तो आपको कोई भी अमीर होने से नहीं रोक पायेगा.    द राईट टू बी रिच (The Right to be Rich) क्या अमीर होने की चाहत रखना गलत है? ऐसा कौन है जो एक आराम की लाइफ नहीं चाहता? क्या ये सपना देखना गलत है? नहीं, बिलकुल नहीं. अमीरी का मतलब सिर्फ पैसे से नहीं है. बल्कि इसका मतलब है कि आपके पास ऐसे टूल्स होने चाहि...

corporate Chanakya

इंट्रोडक्शन(Introduction)
चाणक्य का नाम सुनते ही हमारे मन में बुद्धिमान, चतुर, जीनियसऔर कमाल के strategist जैसे शब्द आने लगते हैं.उनके प्रिंसिपल्स और स्ट्रेटेजीज चाणक्य नीतिके नाम से चर्चित हैं.उन्हें विष्णु गुप्त या कौटिल्य भी कहा जाता है.लेकिन चाणक्य सिर्फ़ पॉलिटिक्स और इकोनॉमिक्स के महारथी ही नहीं थे बल्कि उन्होंने प्रोडक्टिविटी और मैनेजमेंट के लिए भी कई प्रैक्टिकल एडवाइस दिए हैं. इस बुक के द्वारा आप सीखेंगे कि आप कैसे एक हाई परफोर्मिंग एम्प्लोई बन सकते हैं. आप एक अच्छा बॉस बनना सीखेंगे जो अपनी टीम को encourage और मोटीवेट करता है, साथ ही उन्हें अपना पूरा सहयोग भी देता है.
आपको ये सब जो सिखाने वाले हैं वो भी किसी महारथी से कम नहीं हैं. राधा कृष्णन पिल्लई को एक मैनेजमेंट कंसलटेंट के रूप में काम करने का सालों का एक्सपीरियंस है. उन्होंने प्राचीन समय के सबसे बुद्धिमान गुरु और जीनियस के अनमोल ज्ञान को आज के मॉडर्न ज़माने के हिसाब से इन्टरप्रेट किया है. उन्होंने इसे बदलते हुए समय के साथ आज के युग में कैसे अप्लाई करना है वो समझाया है.
वो बखूबी जानते हैं कि ये बहुत असरदार है और 100% काम करता है क्योंकि उन्होंने इसे ख़ुद आज़माया है.
अगर आप जॉब में प्रमोशन पाना चाहते है या अपना ड्रीम जॉब पाना चाहते हैं, ज़्यादा productive बनना चाहते हैं तो ये बुक आपके लिए है.

द फर्स्ट स्टेप (The First Step)
हम सब के मन में अक्सर एक ड्रीम जॉब होता है जिसे हम करना चाहते हैं और इसे पाने के लिए हम हर दिन उस मौके का इंतज़ार करते रहते हैं.लेकिन चाणक्य का कहना है कि आपको इसका इंतज़ार नहीं करना चाहिए. बल्कि खुद एक्टिव होकर उस मौके को क्रिएट करना चाहिए.
आपको थोड़ा एक्स्ट्रा एफर्ट करना होगा, आपको एक्शन लेना होगा. आपको किस्मत के भरोसे नहीं बैठना चाहिए क्योंकि अगर आप इसके बारे में सिर्फ़ इमेजिन करते रहेंगे तो अपना ड्रीम जॉब कभी हासिल नहीं कर पाएँगे.
हाथ पर हाथ रख कर बैठने से कुछ नहीं होगा इसलिए अपने आपको उस जॉब के लिए तैयार करें, प्रॉपर ट्रेनिंग लें, जो स्किल्स उसके लिए चाहिए उसे सीखें. सही लोगों की गाइडेंस और मदद लें. और सबसे ज़रूरी बात, ख़ुद पर विश्वास रखें. अगर एक बार फेल हुए तो निराश ना हों, हार ना मानें. बिना रुके बस लगातार कोशिश करते रहे. साबित करें कि आपमें उसे पाने का कितना जुनून है और आप उसे पाने के कितने लायक हैं.
एक कहावत है “अगर मौके आपके दरवाज़े पर दस्तक ना दे तो आपको मौकों के दरवाज़े पर दस्तक देना होगा”. आइए इसके लिए कुछ टिप्स जानते हैं.
पहला, अपनी ताकत को अच्छे से जानें. बाहर कम्पीट करने से पहले ज़रा रुक कर ध्यान से सोचें. वो कौन सी क्वालिटी है जो आपमें है, वो क्या चीज़ है जिसे आप सबसे अच्छे तरीके से कर सकते हैं? अपने resume या बिज़नेस प्रपोजल में अपनी ख़ासियत को आप हाईलाइट भी कर सकते हैं.
दूसरा, अपनी मार्केटिंग करें. क्या कोई ऐसी कंपनी या इंसान है जिसके लिए आप काम करना चाहते हैं? अगर हाँ तो ख़ुद अपनी मार्केटिंग करें. आप उन्हें अपना resume ईमेल कर सकते हैं. अपने आप को introduce करें, आपके intention के बारे में बताएँ. आप अपॉइंटमेंट के लिए भी पूछ सकते हैं. इस बात का ध्यान रखें कि आप समय पर पहुंचें और एक अच्छा इम्प्रैशन बनाएं.
जब आपको फाइनली अपना ड्रीम जॉब मिल जाए तो याद रखें कि ये तो बस शुरुआत है. अब आपको ख़ुद को साबित करना होगा. अपने काम से प्यार करें और हाई परफॉरमेंस का aim रखें. अगर आप ऐसा करने में सफ़ल हो गए तो इसका आपके लाइफ के हर पहलू में पॉजिटिव असर होगा.
 टेकिंग केयर ऑफ़ एम्प्लोयीज़(Taking Care of Employees)
ये टॉपिक हर मैनेजर और बिज़नेस ओनर के लिए है. अगर आप एक एम्प्लोई हैं तो भी इसे ध्यान से सुनें, क्या पता कल आप भी बॉस बन सकते हैं. टैलेंटेड, हार्ड वर्किंग और  भरोसेमंद लोगों का मिलना बहुत मुश्किल होता है.
जो भी ह्यूमन रिसोर्स में काम करते हैं वो ये बात अच्छी तरह से समझते हैं. हाई सैलरी और प्रेस्टीज लोगों को टिकाए रखने के लिए काफ़ी नहीं है. एक बॉस को अपने सारे एम्प्लोईज़ की सच में परवाह होनी चाहिए.हर आर्गेनाईजेशन में वो ह्यूमन टच होना चाहिए जहां काम करने वालों को लगे कि उन्हें सिर्फ़ स्टाफ़ या मशीन नहीं समझा जाता बल्कि कंपनी का एक एहम हिस्सा माना जाता है. आइए समझते हैं कि इसे किस तरह किया जा सकता है.
पहला,अगर आप बॉस हैं तो अपने केबिन तक सिमट कर ना रहे, बाहर निकलें. आपकी बाउंड्री आपके केबिन या कांफ्रेंस रूम तक सीमित नहीं होनी चाहिए. ऐसे बॉस ना बनें जो अपने एम्प्लोईज़ से दूरी बनाए रखते हैं और उन्हें सिर्फ़ ईमेल द्वारा आर्डर देते हैं. अपने एम्प्लोईज़ को महसूस कराएँ कि वो आप तक आसानी से पहुँच सकते हैं या आपके बात कर सकते हैं.
बीच-बीच में उनके डेस्क पर जाएं. उनसे बात करें. एम्प्लोईज़ को आपको जानने का मौका दें, आप भी उन्हें समझने की कोशिश करें. यह आपकी टीम में सहयोग और एकता को बढ़ावा देगा.
दूसरा, अपने हर एक एम्प्लोई को समय दें. एक्जाम्पल के लिए, अगर किसी एम्प्लोई से गलती हो जाती है तो उसके पास जाएं और कुछ देर उससे बात करें.उसे एक्सप्लेन करें कि आखिर उससे कहाँ गलती हुई है. लेकिन इसे गुस्से से ना करें और ना ही उनकी इंसल्ट करें बल्कि इसे शांति से उसे पूरा रिस्पेक्ट देते हुए करें.
जब कोई गलती करता है या डरा हुआ होता है तो हम अक्सर उसके कंधे पर धीरे से हाथ रखते हैं ताकि उसे बेहतर महसूस हो सके. आप भी ऐसा कर सकते हैं जिससे एम्प्लोई को ये लगेगा कि आप समझते हैं कि गलती होना नेचुरल है और आप उसे सिर्फ़ उसकी गलती बता रहे हैं ना कि उसकी इंसल्ट कर रहे हैं. उसे समझाने के बाद उसकी थोड़ी तारीफ़ भी कर दें, इससे उसे अच्छा लगेगा और उसका कांफिडेंस बना रहेगा.

ऐसा करने से वो एम्प्लोई इस एक्सपीरियंस को याद रखेगा क्योंकि इसमें ह्यूमन टच शामिल था. वह आपके प्रति कोई बुरी भावना ना रखते हुए अपनी गलती के बारे में भी सीखेगा.
तीसरा, एम्प्लोईज़ के साथ पिकनिक का प्लान बनाएं. कभी-कभार ऑफिस के स्ट्रेस और बोरिंग काम से ब्रेक लेना भी अच्छा महसूस कराता है. अपने एम्प्लोईज़ के साथ रिलैक्स करने और एन्जॉय करने का समय निकालें. ये एक टीम डिनर या शहर के पास किसी जगह में कुछ दिनों का ट्रिप भी हो सकता है. ये कोई सेलिब्रेशन या पार्टी भी हो सकता है. ये थकान और स्ट्रेस को मिटाने का काम करता है. ये पूरी ऑफिस में ऐसा माहौल सेट करता है कि आप एक दूसरे पर भरोसा कर सकते हैं.
स्टॉपिंग अट्रीशन (Stopping Attrition)
अब आता है अट्रीशन को रोकना. तो क्या होता है ये अट्रीशन? अट्रीशन का मतलब होता है  resignation के कारण एम्प्लोईज़ को खो देना. किसी भी HR डिपार्टमेंट के लिए ये सबसे बड़ा चैलेंज होता है. एम्प्लोईज़ को कंपनी में टिकाए रखना कोई आसान काम नहीं. उनकी लॉयल्टी को बढ़ावा देने के लिए प्रमोशन या सैलरी का बढ़ा देना अक्सर काफ़ी नहीं होता. resignation की रेट कम रखने के लिए HR को कई स्ट्रेटेजी और प्लानिंग करनी पड़ती है.
चाणक्य के अनुसार दो तरह के एम्प्लोईज़ होते हैं. एक जो संतुष्ट हैं और दूसरे वो जो ख़ुश नहीं हैं .उन्होंने, इन दोनों को कैसा संभालना है उसकी सलाह भी दी है.
Managers को उन एम्प्लोईज़ को अनदेखा करने की गलती नहीं करनी चाहिए जो ख़ुश और संतुष्ट लगते हों. अक्सर ऐसे एम्प्लोईज़ होते हैं जो प्रमोशन या सैलरी बढ़ाने की ख़ुद माँग नहीं करते. हाँ, वो इसे ख़ुद एक्सप्रेस नहीं करते लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि वो सच में satisfied हैं. हर एम्प्लोई काम के बदले में कुछ पाने की इच्छा से काम करता है.
अगर किसी दूसरी कंपनी ने इन्हें एक बेटर ऑफर दी तो यकीनन आप उन्हें खो देंगे. इसलिए आपको एक satisfied एम्प्लोई को ज़्यादा पहचान, फ़ायदा, सैलरी देना चाहिए भले ही वो ख़ुद इसके लिए ना कहें.
ऐसा करने से आप देखेंगे कि वो अपने जॉब के लिए और ज़्यादा मोटीवेट होंगे और आपकी कंपनी के प्रति ज़्यादा लॉयल होंगे क्योंकि आपने उन्हें दिखा दिया है कि आप उनकी कदर करते हैं, उन्हें इम्पोर्टेंस देते हैं.इससे वो आपके पीठ पीछे बात करने या रिजाइन करने के बारे में नहीं सोचेंगे.
और वो एम्प्लोईज़ जो संतुष्ट नहीं हैं, वो जो माँग रहे हैं उसे देने की पूरी कोशिश करें. उन्हें गिफ्ट्स या किसी तरह का बेनिफिट देकर कंपनी में बनाए रखने की कोशिश करें. अट्रीशन से बचने के लिए आइए कुछ इम्पोर्टेन्ट टिप्स के बारे में जानते हैं.
पहला, ह्यूमन रिसोर्स यानी जो लोग आपके लिए काम करते हैं उन्हें सबसे ज़्यादा इम्पोर्टेंस दें. ज़्यादातर कम्पनीज मार्केटिंग, फाइनेंस, सेल्स इस पर अपना ध्यान फोकस करती है. वो ह्यूमन रिसोर्स डिपार्टमेंट (HRD) की अहमियत नहीं समझते. लेकिन आप ये गलती ना दोहराएँ.
HRD का काम सिर्फ़ लोगों को हायर करना, उन्हें ट्रेन करना और रिकॉर्ड बनाए रखना ही नहीं होता. अपने लोगों का ध्यान रखना, उनकी ज़रूरतों को समझना एक कंपनी के लिए सबसे बेस्ट इन्वेस्टमेंट होता है.अगर आपके लोग अच्छे परफ़ॉर्मर हुए तो आपकी कंपनी दूसरों के मुकाबले ज़्यादा तरक्की करेगी.
दूसरा, कंपनी के ओनर को एक खडूस बॉस की जगह एक मेंटर या गुरु की तरह होना चाहिए. एक सीईओ को सिर्फ़ गलती निकालने वाला नहीं बल्कि एक दोस्त, एक टीचर और एक गाइड होना चाहिए. बिज़नेस चलाना उसकी एकमात्र ज़िम्मेदारी नहीं है. उसे अपने एम्प्लोईज़ के लिए एक inspiration बनना चाहिए. अगर एक सीईओ अच्छा एक्जाम्पल सेट करता है तो वो अपने एप्लोईज़ को अपनी तरह ज़िम्मेदार और हार्ड वर्किंग बनने के लिए encourage करता है.
तीसरा, आपके आर्गेनाईजेशन का अपना एक यूनिक कल्चर होना चाहिए. इससे एम्प्लोईज़ को अपने पन का एहसास होता है. ऐसा करने से उन्हें लगेगा कि वो सभी के साथ एक कॉमन गोल शेयर करते हैं. ये उन्हें आपकी कंपनी के प्रति लॉयल और उसका हिस्सा होने के लिए प्राउड महसूस कराएगा.
 चेंजिंग जॉब्स (Changing Jobs)
कभी-कभी हमारे करियर में ऐसा मोड़ आता है जब हम एक ही काम करते करते बोर होने लगते हैं. आपको लगने लगता है कि आप एक रूटीन में फँस गए हैं जहां हर दिन एक ही काम करना पड़ता है. तो ऐसे में आपको नए और ज़्यादा challenging ज़िम्मेदारियों की ज़रुरत होती है.
अगर आपके साथ भी ऐसा कुछ हो रहा है तो निराश ना हों. अगर आपको लगता है कि आपमें काबिलियत है और आपके पास अच्छा ख़ासा एक्सपीरियंस है तो हिम्मत करके अपने बॉस से बात करें.
उन्हें अपनी पोजीशन समझाएँ. उन्हें अपने स्किल्स के बारे में और पास्ट में आपने जो जो अचीव किया है उसके बारे में बताएँ. आप उन्हें ज़्यादा ज़िम्मेदारी सौंपने ने लिए कह सकते हैं, नया प्रोजेक्ट देने के बारे में या एक नए डिपार्टमेंट में भेजने के लिए कह सकते हैं. जॉब बदलने का मतलब हमेशा अपने आर्गेनाईजेशन को छोड़ना नहीं होता.
इसका मतलब ये भी तो हो सकता है कि आपको प्रमोशन मिल रहा है. आइए इसके लिए कुछ टिप्स के बारे में जानते हैं.
पहला, ज़्यादा से ज़्यादा एक्सपीरियंस इकट्ठा करें. अपनी नॉलेज को सीमित मत रखिए. कई लोगों से जानें, सीखें. ट्रेनिंग प्रोग्राम में हिस्सा लेकर अपने स्किल्स को अपग्रेड करें. अगर आप किसी स्किल में एक्सपर्ट हैं तो आप सच में एक हाई पोजीशन पाने के हकदार हैं.
दूसरा, सारे डाक्यूमेंट्स तैयार करें. अपने बॉस से बात करने से पहले अपने सर्टिफिकेट, पोर्टफ़ोलियो, प्रोजेक्ट रिपोर्ट सब इकट्ठा करें. ये आपके पोटेंशियल और टैलेंट के सबूत के रूप में काम करेंगे.
तीसरा, आप कंपनी में और क्या क्या वैल्यू जोड़ सकते हैं उस बारे में बताएँ. थोड़ा रिसर्च करें और क्या बोलना इसकी प्रैक्टिस करें कि अगर आपको प्रमोशन मिला तो कंपनी को आप क्या क्या फ़ायदा करवा सकते हैं.
कमांड प्रमोशन (Command Promotion)
आपको प्रमोशन की माँग करने की या डिमांड करने की ज़रुरत नहीं है. आप इसे अपने एक्शन और रिजल्ट के ज़रिए कंपनी से कमांड कर सकते हैं. इस बात की शिकायत करने से पहले कि आपकी सैलरी काफ़ी नहीं है या आपकी तारीफ़ नहीं की जाती, पहले ख़ुद से पूछें कि क्या आप इस प्रमोशन के लायक हैं? क्या आप अपने जॉब में अपना बेस्ट दे रहे हैं?
चाणक्य ने भी यही स्टैण्डर्ड बनाया है. प्रमोशन इस बात पर निर्भर करना चाहिए कि कोई एम्प्लोई कंपनी को कितना प्रॉफिट करवाता है.किसी भी एम्प्लोई की प्रोडक्टिविटी को मापने का ये सबसे प्रैक्टिकल तरीका है.
इसके बारे में इस तरह सोचें. ये कैलकुलेट करने की कोशिश करें कि आप एक दिन, हफ़्ते या महीने में कितना प्रॉफिट कंपनी में ला सकते हैं. जब आप अपना कॉन्ट्रिब्यूशन कैलकुलेट कर लें तो दोबारा ख़ुद से पूछें, क्या आप सच में ये प्रमोशन deserve करते हैं? आपके द्वारा generate की गई इनकम के आधार पर आपको कौन सी पोजीशन सौंपी जानी चाहिए?
एक एक्चुअल रिपोर्ट बनाएँ, उसमें फिगर्स लिखें. इसका एक ग्राफ बना कर अपने बॉस को एक्सप्लेन करें कि आप क्यों इस प्रमोशन के काबिल हैं. उन्हें फ्यूचर प्रोजेक्ट्स के लिए अपने यूनिक आइडियाज के बारे में बताएँ.
अब अगला स्टेप है एक employer की तरह सोचना. इमेजिन करें कि आप बॉस हैं. अगर आप अपने प्रेजेंट परफॉरमेंस के बेसिसपर प्रमोट हो जाते हैं तो क्या आप इसे एक अच्छा इन्वेस्टमेंट मानंगे? अपने बॉस के नज़रिए से चीज़ों को देखें. वो आपसे क्या उम्मीद करते हैं? आपकी परफॉरमेंस के लिए उनका क्या फीडबैक है? वो कौन सी जिम्मेदारियां हैं जो वो चाहते हैं कि आप पूरी करें?
वहाँ से शुरुआत करें. अपनी परफॉरमेंस के हर पहलू को इम्प्रूव करें. अपने बॉस की उम्मीदों पर खरा उतरें या उससे आगे निकलकर उन्हें सरप्राइज कर दें. आपकी मंथली सैलरी कितनी है? आपकी कंपनी के लिए जितना इनकम आप generate करते हैं वो आपकी सैलरी से ज़्यादा होनी चाहिए. तब आप सच में कह सकते हैं कि आप प्रमोशन या सैलरी में बढ़ोतरी deserve करते हैं.
एक बार एक MBA का स्टूडेंट था जिसका कैंपस में जॉब इंटरव्यू चल रहा था. उस कंपनी के HR ने पूछा, “आप कितनी सैलरी एक्स्पेक्ट कर रहे हैं?”. स्टूडेंट ने कहा, “सर, इस स्टेज पर ये decide करना आपके हाथ में है लेकिन 6 महीने के बाद हम मेरे परफॉरमेंस को रिव्यु करेंगे. तब मैं आपको मेरे एक्चुअल रिजल्ट के बेसिस पर बताऊंगा कि मैं कितनी सैलरी एक्स्पेक्ट कर रहा हूँ”. इस जवाब के कारण उसे तुरंत हायर कर लिया गया.
 मेक पीपल अकाउंटेबल (Make People Accountable)
अपने आर्गेनाईजेशन के लिए सही लोगों को काम पर रखना बेहद मुश्किल काम है और उन्हें अपनी कंपनी में बनाए रखना उससे भी ज़्यादा मुश्किल काम है. लेकिन इससे भी बड़ा चैलेंज है अपने एम्प्लोईज़ को और अच्छा और प्रोडक्टिव बनने के लिए मोटीवेट करना.
जीनियस चाणक्य के पास इसका भी एक प्रैक्टिकल solution है. अगर वर्कर्स unproductive हैं या अपने काम में लापरवाही करते ही जा रहे हैं तो उन्हें फाइन देना चाहिए.
लेकिन इससे पहले कि आप इस डिफिकल्ट सिचुएशन में पहुँचें, यहाँ कुछ टिप्स दिए गए हैं. अगर आप एक मैनेजर हैं तो ये आपको टीम मेंबर्स के साथ डील करने में मदद करेंगे. अगर आप एक एम्प्लोई हैं तो ये आपको गाइड करेंगे ताकि आपको बॉस के द्वारा कभी पनिशमेंट ना मिले.
पहला, आप क्या उम्मीद कर रहे हैं उसे साफ़-साफ़ बताएँ.एम्प्लोईज़ द्वारा गलती करने का एक सबसे बड़ा कारण ये है कि बॉस उन्हें क्लियर इंस्ट्रक्शन नहीं देते. इस बात का ध्यान रखें कि आप एक एम्प्लोई को उसकी सारी जिम्मेदारियों के बारे में ठीक से बताएँ. अगर उनके मन में कोई सवाल है या उन्हें कोई डाउट है तो उसका जवाब दें. सबसे बेस्ट होता है एक एम्प्लोई की जिम्मेदारियों को उन्हें लिख कर देना ताकि वो उसे कंप्यूटर में सेव कर सकें और अगर वो कभी इसे भूल जाते हैं या उन्हें कोई डाउट हो तो वो उसे दोबारा देख सकें.
दूसरा, रिमाइंडर और फॉलो-अप दें. ये ख़ासकर तब करना चाहिए जब आप किसी एम्प्लोई को कोई नया काम सौंपते हैं. आपको पेशेंस के साथ उन्हें गाइड करने की ज़रुरत है. एम्प्लोई भी प्रैक्टिस और समय के साथ सीखते हैं. लेकिन एक बार जब उन्हें काम समझ में आ जाता है तब कम से कम सुपरविज़न से भी काम चल जाता है.
अगर आप एम्प्लोईज़ को गाइड नहीं करेंगे या उन्हें पेशेंस के साथ नहीं सिखाएंगे तो अंत में सारा काम आपको ख़ुद करना पड़ेगा. अगर आप उन पर भरोसा नहीं करेंगे तो ये तो वन मैन टीम वाली बात हो जाएगी जो कि एक कंपनी के लिए बिलकुल healthy नहीं होता.
वहीँ दूसरी ओर अगर मैनेजर के बार बार रिमाइंडर देने के बावजूद, एम्प्लोई बात नहीं सुनते या इंस्ट्रक्शन फॉलो नहीं करते तब समय होता है एक स्ट्रिक्ट रास्ता अपनाने का. अब यहाँ उन्हें सज़ा देना या उन पर फाइन लगाना पिक्चर में आता है. चाणक्य का कहना है कि अब मैनेजर को एक unproductive एम्प्लोई को सज़ा देनी चाहिए.अक्सर एम्प्लोईज़ को लगता है कि ये सब सिर्फ़ उन्हें डराने के लिए कहा जा रहा है और ऐसा असल में नहीं होगा, तो इस बात को साफ़-साफ़ समझाने के लिए इस रूल को स्ट्रिक्टली फॉलो करें. समय-समय पर लोगों को सज़ा देना ज़रूरी हो जाता है.
एक बार जब एम्प्लोईज़ समझ जाते हैं कि उनकी लापरवाही और आलस के लिए उन्हें सच में फाइन देना होगा तब जाकर वो इस आदत को बदलेंगे. अपनी टीम को समझाएं कि उनका रोल कितना इम्पोर्टेन्ट है. उन्हें ये समझाने में मदद करें कि उनका बेहतर परफॉर्म करना सिर्फ़ आपके या कंपनी के लिए ही नहीं बल्कि उनके अपने फ़ायदे के लिए भी बहुत ज़रूरी है. हाई प्रोडक्टिविटी सबके लिए एक विन-विन सिचुएशन होती है.
सिलेक्टिंग द राईट पर्सन (Selecting the Right Person)
ये टॉपिक HR वर्कर्स और छोटे बिज़नेस ओनर्स के लिए है. इंटरव्यू में पूछे जाने वाले घिसे पिटे सवालों से हट कर सोचें. आप किसी कैंडिडेट के एजुकेशन, पास्ट एक्सपीरियंस और उसके स्किल्स के बारे में उसके resume से जान सकते हैं.
चाणक्य का मानना था कि इससे ज़्यादा ज़रूरी होता है किसी के माइंडसेट, उसकी सोच और साइकोलॉजी को जानना. सिर्फ़ इससे ही आप एक इंसान के बारे में ज़्यादा जान पाएंगे. उसकी सोच और मानसिकता से आपको पता चलेगा कि क्या वो सच में कड़ी मेहनत कर सकता है, क्या उसके साथ काम करना एक अच्छा एक्सपीरियंस होगा या क्या उसमें एक  मुश्किल सिचुएशन को हैंडल करने की काबिलियत है.
ऐसे कुछ दिलचस्प सवाल हैं जो आप पूछ सकते हैं.
पहला सवाल, “आपका रोल मॉडल कौन है”? 
अब अक्सर जॉब में इसके बजाय हमेशा ये पूछा जाता है कि अपने बारे में कुछ बताइए. लेकिन क्या ये घिसा-पिटा सवाल नहीं है जो ना जाने कब से पूछा जा रहा है? इसके बजाय अगर आप कैंडिडेट से उसके रोल मॉडल के बारे में पूछेंगे तो आप उसे ज़्यादा अच्छे से समझ पाएँगे. 
ये एक कैंडिडेट की पर्सनालिटी और सोचने के नज़रिए को ज़ाहिर करेगा. आप जानेंगे कि वो किन वैल्यूज को देखता है या क्या बनने की कोशिश कर रहा है.
मान लीजिये कि उसने कहा “बिल गेट्स”, तो आपको अंदाज़ा हो जाएगा कि उसे आईटी में इंटरेस्ट है. शायद उसमें बिज़नेस चलाने का स्किल भी हो. या अगर वो कहता है “गांधीजी” तो इसका मतलब है कि वो एथिक्स, आनेस्टी और अच्छे विचारों को ज़्यादा इम्पोर्टेंस देता है.
दूसरा सवाल, “आप अपना ज़्यादातर समय किसके साथ बिताते हैं?”
ये आपको कैंडिडेट के लाइफस्टाइल और उसकी हॉबी के बारे में आईडिया देगा. आपको ये हिंट मिलेगा कि उसके लिए लाइफ में क्या मायने रखता है. अगर वो कहता है “मेरा परिवार” तो आपको समझ में आ जाएगा कि वो एक फॅमिली पर्सन है जो अपने परिवार को समय भी देता है और उनके प्रति अपनी ज़िम्मेदारी भी समझता है.
अगर वो कहता है कि वो ज़्यादातर समय कुछ ना कुछ पढ़ने में बिताता है तो इसका मतलब है कि वो नॉलेज और ज्ञान को इम्पोर्टेंस देता है. इस तरह, उसका जवाब कुछ भी हो सकता है लेकिन ये उसकी पर्सनालिटी का एक हिस्सा आपके सामने ज़रूर खोल देगा.
तीसरा सवाल “मान लीजिये कि आपसे पूछा जाए.....”
अब ये एक situational सवाल है. इससे आप जानेंगे कि कैंडिडेट का unexpected या मुश्किल समय में किस तरह का रिएक्शन होगा. आप जानेंगे कि वो प्रोब्लम्स को कैसे संभालता है और अपने emotions को कैसे मैनेज करता है.
मान लीजिये कि किसी कैंडिडेट ने सीनियर चार्टर्ड अकाउंटेंट की पोस्ट के लिए अप्लाई किया है तो आप उससे पूछ सकते हैं कि “क्या होगा अगर हम आने वाले साल में आपको मार्केटिंग हेड के रूप में चुनते हैं?” 
अगर वो कहता है कि वो इसे एक्सेप्ट करेगा तो आपको समझ में आ जाएगा कि ये कैंडिडेट बदलाव के अनुसार ढल सकता है यानी चेंज को अच्छे से हैंडल कर सकता है. इससे ये भी पता चलता है कि वो नए स्किल्स सीखने और अपनी नॉलेज को बढ़ाने में दिलचस्पी रखता है और वोबदलाव से हिचकिचाएगा नहीं बल्कि उसे अपनाने के लिए तैयार होगा.
 डोंट बीट अराउंड द बुश (Don’t Beat Around The Bush)
टाइमइस दुनिया की सबसे कीमती और मूल्यवानचीज़ है क्योंकि एक बार जो समय चला गया वो दोबारा कभी नहीं आएगा.अपने ईमेल, फ़ोनकॉल या बातचीत के दौरान सीधे पॉइंट पर आएँ.अपने बॉस या colleague को सीधा काम की बात बताएँ.
ऐसा करना rude नहीं होता. इसका सिर्फ़ ये मतलब होताहै कि आप सामने वाले के टाइम की वैल्यू को समझते हैं. इसके अलावा,आपजितनी जल्द प्रॉब्लम के बारे में बता देंगे उतनी जल्दी आप उसका कोई हल निकाल सकते हैं.
क्या आप कभी ऐसी सिचुएशन में रहे हैं? जॉन अपने मैनेजर के साथ कुछ इम्पोर्टेन्ट discuss करना चाहता था. अपने डेस्क पर बैठे बैठे उसने आधा घंटा हिम्मत जुटाने में और ये सोचने में बिता दिया कि वो क्या कहेगा. लेकिन जब वो मैनेजर के सामने था तो जॉन ने उस मामले को छोड़कर बाकी सभी चीज़ों के बारे में बात की. मैनेजर धीरे धीरे चिढ़ने लगा. जब उसकी irritation बहुत बढ़ गई तो उसने अपनी आवाज़ ऊँची करके कहा, “जॉन, प्लीज पॉइंट पर आओ”. 
तो आपको ये समझने की ज़रुरत है कि हाई पोस्ट पर जो लोग बैठे हैं वो वहाँ इसलिए हैं क्योंकि वो शार्प हैं और टू द पॉइंट बात करते हैं. वो किसी भी प्रॉब्लम की जड़ को बड़ी जल्दी भांप लेते हैं और उसका उपाय भी तेज़ी से निकाल लेते हैं. किसी भी प्रेशर की सिचुएशन में  अच्छे से डिसिशन लेने की उन्हें आदत हो जाती है.
इसलिए अगर आप अपने बॉस से बात करते हैं तो इधर उधर की बात में टाइम waste ना करें. Managers भी ऐसे जूनियर्स को पसंद करते हैं जो शार्प और फ़ास्ट होते हैं. वो ऐसे लोगों के साथ काम करना पसंद करते हैं जिन्हें एक ही बात दो बार बताने की ज़रुरत ना पड़े.
आप A – टीम का हिस्सा बनने के लिए ख़ुद को ट्रेन कर सकते हैं.
सबसे पहले, तेज़, ब्रिलियंट और mature होने की कोशिश करें.बेकार की चीज़ों में अपना टाइम बर्बाद ना करें. कोशिश करें कि ऑफिस में आपका हर मिनट प्रोडक्टिव हो.
दूसरा, एक अच्छे listener बनें. जब आपके बॉस कुछ बताते हैं तो उस पर पूरा ध्यान फोकस करें. अपना ध्यान भटकने ना दें, गौर से उनके हर शब्द को सुनें. प्रैक्टिस के साथ आप भी शार्प और टू द पॉइंट बात करने वाले बन जाएँगे.
तीसरा, ऑफिस में दूरी बनाकर अलग थलग नहीं बल्कि सबसे टच में रहे. अपने साथ काम करने वालों के साथ अच्छा कम्युनिकेशन बनाकर रखें. ऑफिस में सब एक टीम का हिस्सा होते हैं इसलिए आपस में तालमेल रखना ज़रूरी है. अपने गोल पर ध्यान दें.ऑफिस में हर एक को अपने हिस्से का काम समझ कर अपना बेस्ट देना चाहिए.
रिवॉर्ड प्रोडक्टिव पीपल (Reward Productive People)
समय के साथ कई लोग अपने काम में जोश और motivation खोने लगते हैं. यही कारण है कि HR डिपार्टमेंट और managers इंसेंटिव का कांसेप्ट यूज़ करते हैं. इंसेंटिव को आप रिवॉर्ड, बोनस, कोई स्पेशल बेनिफिट कुछ भी कह सकते हैं.अगर कोई एम्प्लोई ज़्यादा प्रोडक्टिव है तो वो इनाम पाने का हकदार हो जाता है.
चाणक्य ने भी इसका ज़िक्र किया है. उन्होंने कहा कि अगर आपके जूनियर ने जितना उसे काम दिया गया था उससे बढ़कर कुछ किया है तो सीनियर को उसकी तारीफ़ करनी चाहिए, इसके साथ ही उसके एक्स्ट्रा एफर्ट के लिए इनाम भी देना चाहिए.
किसी के हाई परफॉरमेंस के लिए उसे बोनस देना भी इसी का हिस्सा है. आइए कुछ ऐसे तरीकों के बारे में जानते हैं कि कैसे किसी बॉस को ज़्यादा प्रोडक्टिव एम्प्लोई को रिवॉर्ड देना चाहिए.
पहला, नोट्स बनाएँ. आप कोई जर्नल बना सकते हैं या कंप्यूटर में फाइल बना सकते हैं. अपने नीचे काम करने वालों का नाम उसमें लिखें. जब भी वो आपकी उम्मीद से बढ़कर कुछ करते हैं तो उसे रिकॉर्ड करें. उन एम्प्लोईज़ की कदर करें, उनकी कीमत को समझें जो इमानदार हैं और अपने काम को जी जान से करते हैं.
दूसरा, नए मौकों की तलाश करें. एक प्रोडक्टिव एम्प्लोई को ज़्यादा मौके देने के लिए बॉस को समय निकालना चाहिए. ये कोई बड़ा काम या एक ऐसा प्रोजेक्ट देना हो सकता है जो कंपनी के लिए बहुत मायने रखता हो. ये उस एम्प्लोई को एहसास दिलाता है कि आप उस  पर भरोसा करते हैं. ये उसमें जोश भरेगा और उसे एहसास होगा कि उसके काम को पसंद किया जा रहा है. अब वो और अच्छा काम करने के लिए मोटीवेट होगा. ये देख कर साथ काम करने वाले दूसरे लोग भी अपना बेस्ट देने के लिए इंस्पायर होंगे.
तीसरा, ज़रुरत होने पर एम्प्लोई को प्रमोट करें. हाई परफॉर्म करने वाले लोग आपकी टीम के लिए किसी एसेट से कम नहीं होते इसलिए उन्हें प्रमोट करने में हिचकिचाइए मत. कड़ी मेहनत करने वाले लोग आपका सबसे अच्छा इन्वेस्टमेंट होते हैं. अगर आप उन्हें इनाम देंगे तो वो भी आपकी उम्मीद से कहीं ज़्यादा आपकी कंपनी के लिए कुछ कर के दिखा सकते हैं.
 वांट टू बी अ गुड बॉस ? (Want to Be a Good Boss?)
कई स्टडीज से ये बात सामने आई है कि अक्सर एम्प्लोई के रिजाइन करने का एक बड़ा कारण उसके बॉस का खराब रवैया या attitude होता है. एक अच्छा मैनेजर बनना काफ़ी मुश्किल काम है. ये किसी बिज़नेस स्कूल या मैनेजमेंट सेमिनार में सिखाया नहीं जा सकता.
लोगों को मैनेज करने के लिए उन्हें समझने, उनकी तरफ़ सहानुभूति रखने और ह्यूमन टच की ज़रुरत होती है. आपको कुछ समय अपने एम्प्लोईज़ के लिए निकालना चाहिए. कुछ मिनटों का समय भी काफ़ी होता है. अगर आप उन्हें कोई नया काम देते हैं तो ठीक से इंस्ट्रक्शन दें. फ़िर उनके डेस्क पर जाकर शांत तरीके से समझाएं.
दूसरा, उनकी परफॉरमेंस पर नज़र रखें. अगर उसने अच्छा काम किया है तो ख़ुद जाकर उसे शाबाशी दें. उसकी पीठ थपथपाकर उसे बताएँ कि उसने कमाल का परफॉर्म किया है और आप उससे बहुत ख़ुश हैं.
तीसरा, अगर एम्प्लोई कोई गलती करता है तो उसे अनदेखा ना करें. उसके पास जाकर उसे समझाएं कि उससे कहाँ गलती हुई है. उसके बाद उसे यकीन दिलाएं कि आप उस पर भरोसा करते हैं और आप जानते हैं कि वो इम्प्रूव करेगा.
इन सब में चंद मिनट लगते हैं. इसके लिए आपको पहल करनी होगी लेकिन यकीन मानिए लोगों को मैनेज करने का ये एक ज़बरदस्त तरीका है.
बॉस को एक गुरु की तरह होना चाहिए जिन्हें परवाह और चिंता दोनों हो. लेकिन इसके साथ ही उसे एक डिसिप्लिन मेन्टेन करने वाला भी होना चाहिए. एक गुरु हमेशा अपने छोटों को गाइड करने के लिए मौजूद होते हैं.
आपको भी ऐसा ही बनने की कोशिश करना होगा. अगर एक बॉस बहुत ज़्यादा स्ट्रिक्ट होता है तो लोगों के मन में उसके किये सिर्फ़ डर होता है. अगर वो बहुत ज़्यादा सॉफ्ट होता है तो taken फॉर ग्रांटेड वाली सिचुएशन पैदा हो जाती है. लेकिन जो बॉस बैलेंस्ड होकर सही समय पर सही पनिशमेंट देता है तो उसके लिए एम्प्लोयी के मन में डर नहीं सम्मान होता है. एक बैलेंस्ड सोच के साथ ही आप लोगों को मैनेज कर पाएंगे, अपनी कंपनी में लंबे समय तक उन्हें टिका पाएंगे और सबसे ज़रूरी बात आप उनके अंदर छुपे पोटेंशियल को बाहर निकाल पाएँगे.
कन्क्लूज़न (Conclusion)
तो एक एम्प्लोई के रूप में आपने सीखा कि आपको अपने ड्रीम जॉब को पाने के लिए किस्मत के भरोसे इंतज़ार नहीं करना चाहिए. आपको एक्शन लेकर अपना रास्ता ख़ुद बनाना होगा. अगर आप एक ही काम करते करते ऊब गए हैं तो अपने बॉस से और ज़िम्मेदारियाँ मांगें. ख़ुद एक्टिव होकर बदलाव लाएं. किसी चीज़ के बारे में शिकायत करने से पहले ख़ुद से पूछें कि आप कंपनी के लिए क्या क्या कर रहे हैं.
एक बॉस के रूप में आपने समझा कि आपको अपने एम्प्लोईज़ की ज़रूरतों का भी ध्यान रखना होगा. उन्हें सिर्फ़ स्टाफ नहीं बल्कि अपनी कंपनी का एक अहम् हिस्सा समझें. कोई एम्प्लोई अगर नाख़ुश है तो उसे समझने की कोशिश करें. हमेशा क्लियर इंस्ट्रक्शन दें.
अपने एम्प्लोईज़ की पीठ थपथपाने का और उन्हें इनाम देने की भी पहल करें.अपने सारे एम्प्लोईज़ के साथ बिना किसी भेदभाव के एक जैसा व्यवहार करें. उन्हें इन्सल्ट करने की बजाय शांति और रिस्पेक्ट के साथ समझाएं. जब आप ह्यूमन टच देंगे तो आपका अपने एम्प्लोई और एम्प्लोई का कंपनी के साथ एक अलग कनेक्शन बनने लगेगा.
आपको भी प्रमोशन मिल सकता है. प्रैक्टिस के साथ अपने स्किल को और बढ़ाएं. अपने गोल पर फोकस करें. ख़ुद को ज़्यादा प्रोडक्टिव बनाने पर ध्यान दें. अगर आपको अपने करंट जॉब में रिवॉर्ड नहीं किया जाता है तो निराश ना हों यकीनन आपके लिए नए मौकों के दरवाज़े खुलेंगे. हिम्मत हारे बिना डट कर लगे रहे और हमेशा एक पॉजिटिव नज़रिया बनाए रखें.
हम में से कोई जिंदगी में हारना नहीं चाहता, हम सब एक पहचान की तलाश में रहते हैं. हम सब अपनाए जाने की इच्छा करते हैं इसलिए अपने साथ काम करने वालों की भावनाओं को समझना बेहद ज़रूरी है.ये ह्यूमन टच आपके आर्गेनाईजेशन को दूसरों से बिलकुल अलग बना देगा जो आपको अपार सफ़लता दिलाएगा.
 

Comments

  1. Thanks for sharing.I found a lot of interesting information here. A really good post, very thankful and hopeful that you will write many more posts like this one.
    health tips in urdu

    ReplyDelete

Post a Comment

Tell the next book summary you want

Popular posts from this blog

The Tatas:How a Family Built The Business

इंट्रोडक्शन (परिचय)  टाटा ग्रुप एक इन्डियन ग्लोबल बिजनेस है और ये बात हम प्राउड से बोल सकते है. लेकिन टाटा ग्रुप की इस फेनामोंनल सक्सेस का राज़ क्या है? कैसे उनका सफर शुरू हुआ? टाटा कल्चर क्या है? नाम, पॉवर, पैसा और सक्सेस– टाटा के पास सबकुछ है. लेकिन ऐसा क्या है जो उन्हें दुनिया के बाकि बिलेनियर्स से अलग बनाता है? आपके इन्ही सब सवालों के जवाब और बाकि और भी बहुत सी बाते आप इस बुक में पढेंगे.    नुस्सेरवांजी ऑफ़ नवसारी (Nusserwanji of Navsari) टाटा ग्रुप की शुरुवात एक इंसान ने की थी जिनका नाम था नुस्सरवान (Nusserwan). 1822 में जब उनका जन्म हुआ था तो एक एस्ट्रोलोजर ने कहा था कि एक दिन नुसरवान सारी दुनिया में राज़ करेगा.  वो बहुत अमीर आदमी बनेगा लेकिन नवसारी में पैदा हुआ हर एक बच्चा अच्छी किस्मत लेकर ही पैदा होता था. लेकिन नुसरवांजी टाटा औरो से अलग थे क्योंकि उन्होंने उस एस्ट्रोलोज़र की बात को सच कर दिखाया था. जैसा कि उन दिनों रिवाज़ था, नुसरवांजी टाटा की भी बचपन में ही शादी करा दी गई थी. और 17 साल की उम्र में वो एक बेटे के बाप भी बन गए थे. बच्चे का नाम जमशेद रखा गया....

The power of Habit ||

भूमिका आज सुबह जब आप नींद से जगे, आपने सबसे पहले क्या किया? लपक कर शावर के नीचे चले गए, ईमेल चेक किया, या किचन काउंटर से एक डोनट उठा लिया? आपने नहाने से पहले दाँतों को ब्रश किया या बाद में?  काम पर किस रास्ते से ड्राइव करते हुए गए? जब आप घर लौटे, तब क्या आपने स्नीकर्स पहना और दौड़ने निकल पड़े, या अपने लिए एक ड्रिंक ग्लास में डाला और टीवी के सामने डिनर के लिए बैठ गए? विलियम जेम्स ने 1892 में लिखा था, “हमारा पूरा जीवन, जब तक यह एक निश्चित आकार में है, आदतों का पुंज है ।” हर दिन किए गए चुनाव हमें सोच-समझ कर लिए गए निर्णयों के परिणाम लग सकते हैं, पर वे हैं नहीं। वे आदतें हैं। और हालांकि हर आदत का अपने-आप में कुछ मायने नहीं होता, समय के साथ, हम किस खाने का ऑर्डर देते हैं, बचत करते हैं या खर्च करते हैं, कितने अक्सर कसरत करते हैं, और जिस तरह हम आपनी सोचों और काम की रूटीन को संवारते हैं – इनका हमारे स्वास्थ्य, प्रोडक्टिविटी, फायनैंशियल सिक्योरिटी और प्रसन्नता पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। 2006 में प्रकाशित किए गए ड्यूक यूनिवर्सिटी के एक रिसर्चर के पेपर ने पाया कि लोगों द्वारा किए गए 40 प्र...

MILLION DOLLAR HABIT || BRIAN TRACY

इंट्रोडक्शन (Introduction) क्या आप भी मिलेनियर बनने का ड्रीम देखते है? अगर जवाब है हां, तो ये बुक आपको ज़रूर पढनी चाहिए. क्योंकि बिलेनियर बनने का ड्रीम कोई बेकार का या होपलेस ड्रीम नहीं है. ये कोई ऐसा सपना नहीं है जो सच ना हो सके. आपसे पहले भी कई लोगो ने ऐसे सपने देखे थे और वो लोग भी आपकी तरह गरीब थे, या कम पढ़े लिखे थे, उनके पास कोई ख़ास स्किल भी नहीं थी मगर बावजूद इसके वो सब चेलेंजेस को पार करके सक्सेसफुल बने है. तो आप ऐसा क्यों नहीं कर सकते? बिलकुल कर सकते है. आप कौन हो? कहाँ से हो? क्या करते हो? इन सब बातो से कोई फर्क नहीं पड़ता. ज़रूरत है तो बस इस बात की कि आप बिलेनियर्स लोगो की हैबिट्स सीख लो. आप भी वही करो जो इन सक्सेसफुल लोगो ने किया. दरअसल सक्सेसफुल लोगो की कुछ गुड हैबिट्स होती है जबकि अनसक्सेसफुल लोगो के पास बेड हैबिट्स होती है. ये बुक आपको उन अच्छी हैबिट्स के बारे में सिखाएगी जिन्हें प्रेक्टिस करके आप भी एक मिलेनियर बनकर अपना सपना पूरा कर सकते हो.   यू आर व्हट यू डू (You Are What You Do) ज़रा उन लोगो के बारे में सोचो जो आपको मोस्ट सक्सेसफुल लगते है. ऐसा क्या है उनमे जो...